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नूंह , 09 जून: हरियाणा सरकार की ओर से आज संत कबीर दास जयंती पर कार्यक्रम नूंह के यासीन मेव डिग्री कालेज में आयोजित किया जाएगा।

नूंह , 09 जून: हरियाणा सरकार की ओर से आज संत कबीर दास जयंती पर कार्यक्रम नूंह के यासीन मेव डिग्री कालेज में आयोजित किया जाएगा। जिसमें मुख्यतिथि के रुप में हरियाणा के जनस्वास्थ्य एवं अभियंत्रिक मंत्री डा. बनवारी लाल ने भाग लिया।

जनस्वास्थ्य एवं अभियंत्रिक मंत्री डा. बनवारी लाल ने सभी को संत कबीर दास जयंती की हार्दिक बधाई दी और सबको उनके बताए हुए रास्तों पर चलने को कहा। उन्होंने कहा कि हरियाणा सरकार सभी महापुरुषों की जयंती मना रही है। साथ कहा कि सभी जयंती सरकारी तर्ज पर मना रही है। उन्होंने कहा की सभी जाति धर्म को भूलकर मनवता के रास्ते पर चलना चाहिए तथा कहा कि सभी धर्मो को साथ देना का सपना हरियाणा सरकार कर रही है।

डा. बनवारी लाल ने बताया कि संत कबीर जन्म सन 1398 ई. में काशी में हुआ था. कबीर का पालन पौषण नीरू और नीमा नामक जुलाहे दम्पत्ति ने किया था। इनका विवाह लोई नाम की कन्या से हुआ जिससे एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली का जन्म हुआ। कबीर ने अपने पैतृक व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरू किया और धार्मिक प्रवृतियो के कारण कबीर रामानंद के शिष्य बन गए। कबीर पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए उनका ज्ञान पुस्तकीय या शास्त्रीय नहीं था अपने जीवन में उन्होंने जो अनुभव किया, जो साधना से पाया, वही उनका अपना ज्ञान था जो भी ज्ञानी विद्वान उनके संपर्क में आते उनसे वे कहा करते थे। ‘तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखों की देखी’ सैकडो पोथियां पुस्तकें पढने की बजाए वे प्रेम का ढाई अक्षर पढक़र स्वयं को धन्य समझते थे। कबीर को बाह्य आडंबर दिखावा और पाखंड से चिढ़ थी मौलवियो और पंडितो के कर्मकांड उनको पसंद नी थे, मस्जिदों में नमाज पढना, मंदिरों में माला जपना, तिलक लगाना, मूर्तिपूजा करना रोजा या उपवास रखना आदि को कबीर आडम्बर समझते थे. कबीर सादगी से रहना, सादा भोजन करना पसंद करते थे, बनावट उन्हें अच्छी नहीं लगती थी, अपने आस-पास के समाज को वे आडम्बरो से मुक्त बनाना चाहते थे।

उन्होंने कहा की उस समय लोगो के बीच में ऐसी धारणा फैली हुई थी कि मगहर में मरने से नरक मिलता है. इसलिए कबीर अपनी मृत्यु निकट जानकर काशी से मगहर चले गये और समाज में फैली हुई इस धारणा को तोडा सन 1518 ई. में उनका निधन हो गया। मंत्री जी ने बताया कि उनकी वाणी आज के भेदभाव भरे समाज में मानवीय एकता का रास्ता दिखने में सक्षम है। कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। ऐसा भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म का ज्ञान हुआ। एक दिन कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढय़िों पर गिर पड़े थे, रामानन्द ज उसी समय गंगास्नान करने के लिए सीढय़िां उतर रहे थे कि उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल राम-राम शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- हम कासी में प्रकट भये हैं,रामानन्द चेताए। अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदु-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फक़ीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को आत्मसात कर लिया।

इस मौके पर उपायुक्त मनीराम शर्मा, पुलिस अधीक्षक नाजनीन भसीन,अंडर ट्रनिंग आई.ए.एस. राहुल नरवाल, नगराधीश प्रदीप अहलावत, जिला शिक्षा अधिकारी दिनेश शास्त्री, जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी राकेश मोर, भाजपा जिला अध्यक्ष सुरेंद्र देशवाल, चैयरमैन जाहिद हुसैन, भाजपा के कार्यकर्ता भी मौजूद रहें।